ফাতওয়া  নং  ১৯০

হালাল-হারাম মিশ্রিত ব্যবসার লভ্যাংশের হুকুম কী? -মুফতি আবু ‍মুহাম্মাদ আব্দুল্লাহ আলমাহদি (হাফিযাহুল্লাহ)

হালাল-হারাম মিশ্রিত ব্যবসার লভ্যাংশের হুকুম কী? -মুফতি আবু ‍মুহাম্মাদ আব্দুল্লাহ আলমাহদি (হাফিযাহুল্লাহ)

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হালাল-হারাম মিশ্রিত ব্যবসার লভ্যাংশের হুকুম কী?

 

প্রশ্ন: 

বেশ কিছু দিন আগে আমি নিজের ব্যক্তিগত হালাল সম্পদের মাধ্যমে ব্যবসা শুরু করি। কিন্তু কিছুদিন পর সেই ব্যবসায় লোকসানের শিকার হই। তাই ব্যবসা ছেড়ে দিয়ে যে টাকা অবশিষ্ট ছিল তা সুদি কারবারে বিনিয়োগ করি। এক পর্যায়ে মূলধন ও সুদ মিলিয়ে আমার মোটা অংকের একটা এমাউন্ট (ক্যাশ) প্রতিষ্ঠা হয়। তারপর সুদি কারবার ছেড়ে দিয়ে কিছু মেশিনারিজ সামগ্রী ক্রয় করে নতুন করে ব্যবসা শুরু করি। উক্ত ব্যবসার উপর ভিত্তি করেই এখন আমি আর্থিকভাবে স্বচ্ছল। এখনো এই ব্যবসা চলমান।

সারকথা হল, ব্যবসা শুরু করার সময় আমার পুঁজিতে হালাল-হারাম দু’ধরনের সম্পদই ছিল। আল্লাহর অনুগ্রহে বর্তমানে আমি নিজের অতীতের ভুল বুঝতে পেরেছি এবং এখন আমার সম্পদকে হারাম মুক্ত করতে চাচ্ছি। সুতরাং সম্মানিত মুফতি সাহেবের নিকট আমার বিনীত নিবেদন, এর উপায় কী হতে পারে, তা স্ববিস্তারে জানিয়ে বাধিত করবেন।

নিবেদক-

আব্দুল্লাহ মুহাম্মাদ

 

উত্তর:

এ অবস্থায় আপনার সম্পদকে হারামমুক্ত করতে হলে আপনার চলমান ব্যবসার শুরুতে যে পরিমাণ সুদের অর্থ ছিল, তা যাদের থেকে আপনি সুদ হিসেবে গ্রহণ করেছিলেন, তাদেরকে ফিরিয়ে দিতে হবে। তারা জীবিত না থাকলে তাদের ওয়ারিশদের ফিরিয়ে দিতে হবে। যদি তাদের কাউকেই পাওয়া না যায়, তাহলে হারাম থেকে দায় মুক্তির উদ্দেশ্যে তাদের পক্ষ থেকে তা গরিব মিসকিনকে সাদকা করে দিতে হবে। অবশ্য শায়খুল ইসলাম ইবনে তাইমিয়া রহ. বলেছেন, ‘যে ব্যক্তি হারাম থেকে দায়মুক্ত হতে চায় এবং তওবা করতে চায়; অথচ তা মালিকের নিকট পৌঁছানো সম্ভব নয়, তাহলে সে যেন তা মালিকের পক্ষ থেকে জিহাদের পথে খরচ করে। এটা দায়মুক্তির উত্তম পথ এবং এতে সে জিহাদে অংশ গ্রহণেরও সওয়াব পাবে।’

তা না করে উক্ত সম্পদ ব্যবহার করা যেমন হারাম, তেমনি তার মুনাফা দ্বারা উপকৃত হওয়াও হারাম।

সুদের মূল অর্থ মালিক বা তার ওয়ারিশকে ফিরিয়ে দেয়া কিংবা গরিবকে সাদকা করার পর, বিগত দিন তা থেকে যে মুনাফা অর্জিত হয়েছে, তা হালাল হবে কি না, এ বিষয়ে উলামায়ে কেরামের মতভেদ রয়েছে। কেউ বলেছেন, সুদের মূল অর্থ পরিশোধের পর ইতিপূর্বে অর্জিত মুনাফা হালাল গণ্য হবে। কেউ বলেছেন মুনাফা হালাল হবে না; বরং তাও সাদকা করে দিতে হবে।

বলা বাহুল্য, মুমিনের জীবনে হারামের বিষয়টি খুবই স্পর্শকাতর। সুতরাং সতর্কতার দাবি হল, দুনিয়ার এই তুচ্ছ সম্পদের মোহ ত্যাগ করে; সুদ থেকে প্রাপ্ত মুনাফাসহ সাদকা করে দেয়া এবং এটাই একজন সচেতন ও খাঁটি মুমিনের বৈশিষ্ট্য। এতে কারো দ্বিমত নেই।

عن النعمان بن بشير يقول سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول الحلال بين والحرام بين وبينهما مشبهات لا يعلمها كثير من الناس فمن اتقى المشبهات استبرأ لدينه وعرضه ومن وقع في الشبهات كراع يرعى حول الحمى يوشك أن يواقعه -صحيح البخاري، رقم: 52؛ ط. دار طوق النجاة

 

“নু’মান ইবনে বাশির রাযি. বলেন, আমি রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি, হালাল সুস্পষ্ট এবং হারাম সুস্পষ্ট। এদুটির মাঝে আছে কিছু সংশয়পূর্ণ বিষয়, যা অনেক মানুষ জানে না। যে ব্যক্তি এই সংশয়পূর্ণ বিষয়গুলো থেকে বেঁচে থাকল, সে তার দ্বীন ও সম্মান নিয়ে নিরাপদ থাকল। আর যে ব্যক্তি সংশয়পূর্ণ বিষয়গুলোতে নিপতিত হল, তার উদাহরণ এমন ব্যক্তি, যে বাদশাহর সংরক্ষিত ও নিষিদ্ধ চারণভূমির পাশেই পশু চরায়। সমূহ সম্ভাবনা আছে যে, এই আচরণ তাকে অচিরেই নিষিদ্ধ অংশে নিপতিত করে ছাড়বে।” -সহীহ বুখারী, হাদীস নং ৫২

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله عليه و سلم ( من كانت له مظلمة لأحد من عرضه أو شيء فليتحلله منه اليوم قبل أن لا يكون دينار ولا درهم إن كان له عمل صالح أخذ منه بقدر مظلمته وإن لم تكن له حسنات أخذ من سيئات صاحبه فحمل عليه ) -صحيح البخاري، رقم: 2317؛ ط. دار ابن كثير، اليمامة – بيروت؛ تحقيق: د. مصطفى ديب البغا

“আবু হুরায়রা রা. থেকে বর্ণিত, রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, কেউ যদি কারো সম্মান ক্ষুণ্ন করে বা অন্য কোনো বিষয়ে তার উপর জুলুম করে, সে যেন সেই দিন আসার আগে আজই তার থেকে দায় মুক্ত হয়ে নেয়, যেদিন একটি দিনার বা একটি দিরহামও থাকবে না। যদি জালিমের কোনো নেক আমল থাকে, তাহলে জুলুম সমপরিমাণ নেক আমল নিয়ে নেয়া হবে। নেক আমল না থাকলে; মাজলুমের সমপরিমাণ গোনাহ জালিমের উপর চাপিয়ে দেয়া হবে।” -সহীহ বোখারী, হাদীস নং২৩১৭

 

فقط، والله تعالى أعلم بالصواب

المراجع والمصادر

قوله تعالي: “يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَكُمْ بَيْنَكُمْ بِالْبَاطِلِ إِلَّا أَنْ تَكُونَ تِجَارَةً عَنْ تَرَاضٍ مِنْكُمْ” (النساء: 29)

قال الإمام أبو بكر الجصاص (م: 370ه) : وأكل مال الغير بالباطل قد قيل فيه وجهان: أحدهما: ما قال السدي، وهو أن يأكل بالربا والقمار والبخس والظلم. وقال ابن عباس والحسن: أن يأكله بغير عوض …. اهـ. (أحكام القرآن 2/216 ، دار الكتب العلمية)

قوله تعالى: يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَذَرُوا مَا بَقِيَ مِنَ الرِّبَا إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ (278) فَإِنْ لَمْ تَفْعَلُوا فَأْذَنُوا بِحَرْبٍ مِنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ وَإِنْ تُبْتُمْ فَلَكُمْ رُءُوسُ أَمْوَالِكُمْ لَا تَظْلِمُونَ وَلَا تُظْلَمُونَ (279) –البقرة 278-279

عن جابر قال لعن رسول الله -صلى الله عليه وسلم- آكل الربا وموكله وكاتبه وشاهديه وقال هم سواء. -صحيح مسلم، رقم: 4177؛ ط. دار الجيل بيروت + دار الأفاق الجديدة ـ بيروت

عن كعب بن عجرة، قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم: … يا كعب بن عجرة، إنه لا يربو لحم نبت من سحت إلا كانت النار أولى به» قال ابو عيسى الترمذي: «هذا حديث حسن غريب من هذا الوجه، لا نعرفه إلا من حديث عبيد الله بن موسى»، [ص:514] ” وأيوب بن عائذ يضعف ويقال: كان يرى رأي الإرجاء «،» وسألت محمدا عن هذا الحديث، فلم يعرفه إلا من حديث عبيد الله بن موسى واستغربه جدا ” –سنن الترمذي، رقم: 614؛ ط. شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي الحلبي – مصر، [حكم الألباني] : صحيح

قوله تعالى: إنَّ اللَّهَ يَأْمُرُكُمْ أَنْ تُؤَدُّوا الْأَمَانَاتِ إِلَى أَهْلِهَا –سورة النساء : 58

عن أبي هريرة رضي الله عنه قال : قال رسول الله صلى الله عليه و سلم ( من كانت له مظلمة لأحد من عرضه أو شيء فليتحلله منه اليوم قبل أن لا يكون دينار ولا درهم إن كان له عمل صالح أخذ منه بقدر مظلمته وإن لم تكن له حسنات أخذ من سيئات صاحبه فحمل عليه ) -صحيح البخاري، رقم: 2317؛ ط. دار ابن كثير، اليمامة – بيروت؛ تحقيق: د. مصطفى ديب البغا

عن سمرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: «على اليد ما أخذت حتى تؤدي» قال ابو عيسى الترمذي رحمه الله تعالى: هذا حديث حسن. -سنن الترمذي، رقم: 1266؛ ط. شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي الحلبي – مصر. وسنن ابي داود، رقم: 3562؛ ط. دار الرسالة العالمية، ت: شعَيب الأرنؤوط – محَمَّد كامِل قره بللي، قال الشيخ شعَيب الأرنؤوط في تحقيقه: حسن لغيره، وهذا إسناد رجاله ثقات، لكن الحسن -وهو البصري- لم يصرح بسماعه من سمرة. قتادة: هو ابن دعامة السدوسي، وابن أبي عروبة: هو سعيد، ويحيى: هو ابن سعيد القطان. وأخرجه ابن ماجه (2400)، والترمذي (1312)، والنسائي في “الكبرى” (5751) من طريق سعيد بن أبي عروبة، بهذا الإسناد. وقال الترمذي: حديث حسن. وهو في “مسند أحمد” (20086). ويشهد له حديث صفوان بن أمية وحديث أبي أمامة الآتيان بعده. اهـ

روى الإمام البخاري رحمه الله تعالى في ترجمة الباب: اشترى ابن مسعود جارية والتمس صاحبها سنة فلم يجده وفقد فأخذ يعطي الدرهم والدرهمين وقال اللهم عن فلان فإن أتى فلان فلي وعلي وقال هكذا فافعلوا باللقطة، وقال ابن عباس نحوه -صحيح البخاري، كتاب الطلاق،  باب حكم المفقود في أهله وماله؛ ط. دار طوق النجاة؛ قال الحافظ ابن حجر رحمه الله تعالى: وقد وصله سفيان بن عيينة في جامعه رواية سعيد بن عبد الرحمن عنه، وأخرجه أيضا سعيد بن منصور عنه بسند له جيد أن بن مسعود اشترى جارية الخ قوله “وقال بن عباس نحوه” وصله سعيد بن منصور من طريق عبد العزيز بن رفيع عن أبيه. اهـ فتح الباري 9\430-431

قال الحافظ ابن حجر رحمه الله تعالى: قوله واشترى بن مسعود جارية فالتمس صاحبها سنة فلم يجده وفقد فأخذ يعطي الدرهم والدرهمين وقال اللهم عن فلان فإن أتى فلان فلي وعلي وقع في رواية الأكثر أتى بالمثناة بمعنى جاء وللكشميهني بالموحدة من الامتناع وسقط هذا التعليق من رواية أبي ذر عن السرخسي وقد وصله سفيان بن عيينة في جامعه رواية سعيد بن عبد الرحمن عنه وأخرجه أيضا سعيد بن منصور عنه بسند له جيد أن بن مسعود اشترى جارية بسبعمائة درهم فإما غاب صاحبها وإما تركها فنشده حولا فلم يجده فخرج بها إلى مساكين عند سدة بابه فجعل يقبض ويعطي ويقول اللهم عن صاحبها فإن أتى فمني وعلي الغرم وأخرجه الطبراني من هذا الوجه أيضا وفيه أبى بالموحدة قوله وقال هكذا فافعلوا باللقطة يشير إلى أنه انتزع فعله في ذلك من حكم اللقطة للأمر بتعريفها سنة والتصرف فيها بعد ذلك فإن جاء صاحبها غرمها له فرأى بن مسعود أن يجعل التصرف صدقة فإن أجازها صاحبها إذا جاء حصل له أجرها وإن لم يجزها كان الأجر للمتصدق وعليه الغرم لصاحبها وإلى ذلك أشار بقوله فلي وعلي أي فلي الثواب وعلي الغرامة وغفل بعض الشراح فقال معنى قوله فلي وعلي لي الثواب وعلي العقاب أي أنهما مكتسبان له بفعله والذي قلته أولى لأنه ثبت مفسرا في رواية بن عيينة كما ترى وأما قوله في رواية الباب فلي فمعناه فلي ثواب الصدقة وإنما حذفه للعلم به.

قوله وقال بن عباس نحوه ثبت هذا التعليق في رواية أبي ذر فقط عن المستملي والكشميهني خاصة وقد وصله سعيد بن منصور من طريق عبد العزيز بن رفيع عن أبيه أنه ابتاع ثوبا من رجل بمكة فضل منه في الزحام قال فأتيت بن عباس فقال إذا كان العام المقبل فانشد الرجل في المكان الذي اشتريت منه فإن قدرت عليه وإلا تصدق بها فإن جاء فخيره بين الصدقة وإعطاء الدراهم وأخرج دعلج في مسند بن عباس له بسند صحيح عن بن عباس قال انظر هذه الضوال فشد يدك بها عاما فإن جاء ربها فادفعها إليه وإلا فجاهد بها وتصدق فإن جاء فخيره بين الأجر والمال. اهـ فتح الباري: ج: 9، ص: 430-431، ط. دار المعرفة – بيروت

قال ابو عمر ابن عبد البر رحمه الله (ت 463هـ) فى التمهيد: وأجمع العلماء على أن على الغال أن يرد ما غل إلى صاحب المقاسم إن وجد السبيل إلى ذلك وأنه إذا فعل ذلك فهي توبة له وخروج عن ذنبه واختلفوا فيما يفعل بما غل إذا افترق أهل العسكر ولم يصل إليهم فقال جماعة من أهل العلم يدفع إلى الإمام خمسه ويتصدق بالباقي وهذا مذهب الزهري ومالك والأوزاعي والليث والثوري وروى ذلك عن عابدة بن الصامت ومعاوية بن أبي سفيان والحسن البصري وهو يشبه مذهب ابن مسعود وابن عباس لأنهما كانا يريان أن يتصدق بالمال الذي لا يعرف صاحبه … ذكر سنيد حدثنا أبو فضالة عن أزهر ابن عبد الله قال غزا مالك بن عبد الله الخثعمي أرض الروم فعل رجل مائة دينار فأتى بها معاوية بن أبي سفيان فأبى أن يقبلها وقال قد نفر الجيش وتفرق فخرج فلقي عبادة بن الصامت فذكر ذلك له فقال ارجع إليه فقل له خذ خمسها أنت ثم تصدق أنت بالبقية فإن الله عالم بهم جميعا فأتى معاوية فأخبره فقال لأن كنت أنا أفنتيتك بهذا كان أحب إلي من كذا وكذا وقد أجمعوا في اللقطة على جواز الصدقة بها بعد التعريف وانقطاع صاحبها وجعلوه إذا جاء مخيرا بين الأجر والضمان وكذلك الغصوب وبالله والتوفيق –التمهيد، ج: 2، ص: 23-25، ط. وزارة عموم الأوقاف والشؤون الإسلامية – المغرب

قال ابن القيم (ت751هـ) رحمه الله تعالى في زاد المعاد، ج: 5، ص: 690، ط. مؤسسة الرسالة، بيروت – مكتبة المنار الإسلامية، الكويت: فإن قيل: فما تقولون في كسب الزانية إذا قبضته، ثم تابت هل يجب عليها رد ما قبضته إلى أربابه، أم يطيب لها، أم تصدق به؟ قيل هذا ينبني على قاعدة عظيمة من قواعد الإسلام، وهي أن من قبض ما ليس له قبضه شرعا، ثم أراد التخلص منه، فإن كان المقبوض قد أخذ بغير رضى صاحبه، ولا استوفى عوضه رده عليه. فإن تعذر رده عليه، قضى به دينا يعلمه عليه، فإن تعذر ذلك، رده إلى ورثته، فإن تعذر ذلك، تصدق به عنه، فإن اختار صاحب الحق ثوابه يوم القيامة، كان له. وإن أبى إلا أن يأخذ من حسنات القابض، استوفى منه نظير ماله، وكان ثواب الصدقة للمتصدق بها، كما ثبت عن الصحابة – رضي الله عنهم. اهـ

قال الحصكفي (1088هـ) رحمه الله تعالى: (وعرف) أي نادى عليها حيث وجدها، وفي المجامع (إلى أن علم أن صاحبها لا يطلبها أو أنها تفسد إن بقيت كالاطعمة) والثمار … (فينتفع) الرافع (بها لو فقيرا وإلا تصدق بها على فقير ولو على أصله وفرعه وعرسه، إلا إذا عرف أنها لذمي فإنها توضع في بيت المال) تاترخانية … فإن جاء مالكها) بعد التصدق (خير بين إجازة فعله ولو بعد هلاكها) وله ثوابها (أو تضمينه). –الدر المختار، ص: 355، ط. دار الكتب العلمية

وقال أيضا (الدر المختار، ص: 356): (عليه ديون ومظالم جهل أربابها وأيس) من عليه ذلك (من معرفتهم فعليه التصدق بقدرها من ماله وإن استغرقت جميع ماله) هذا مذهب أصحابنا لا نعلم بينهم خلافا، كمن في يده عروض لا يعلم مستحقيها اعتبارا للديون بالاعيان (و) متى فعل ذلك (سقط عنه المطالبة) من أصحاب الديون (في العقبى) مجتبى. اهـ

قال ابن عابدين (ت1252هـ) رحمه الله تعالى تحته فى رد المحتار، ج: 4، ص: 283 ما نصه: (قوله: جهل أربابها) يشمل ورثتهم، فلو علمهم لزمه الدفع إليهم؛ لأن الدين صار حقهم. وفي الفصول العلامية: من له على آخر دين فطلبه ولم يعطه فمات رب الدين لم تبق له خصومة في الآخرة عند أكثر المشايخ؛ لأنها بسبب الدين وقد انتقل إلى الورثة. والمختار أن الخصومة في الظلم بالمنع للميت، وفي الدين للوارث. قال محمد بن الفضل: من تناول مال غيره بغير إذنه ثم رد البدل على وارثه بعد موته برئ عن الدين وبقي حق الميت لظلمه إياه، ولا يبرأ عنه إلا بالتوبة والاستغفار والدعاء له. اهـ. (قوله: فعليه التصدق بقدرها من ماله) أي الخاص به أو المتحصل من المظالم. اهـ. ط وهذا إن كان له مال. وفي الفصول العلامية: لو لم يقدر على الأداء لفقره أو لنسيانه أو لعدم قدرته قال شداد والناطفي رحمهما الله تعالى: لا يؤاخذ به في الآخرة إذا كان الدين ثمن متاع أو قرضا، وإن كان غصبا يؤاخذ به في الآخرة، وإن نسي غصبه، وإن علم الوارث دين مورثه والدين غصب أو غيره فعليه أن يقضيه من التركة، وإن لم يقض فهو مؤاخذ به في الآخرة، وإن لم يجد المديون ولا وارثه صاحب الدين ولا وارثه فتصدق المديون أو وارثه عن صاحب الدين برئ في الآخرة.

مطلب فيمن عليه ديون ومظالم جهل أربابها (قوله: كمن في يده عروض لا يعلم مستحقيها) يشمل ما إذا كانت لقطة علم حكمها، وإن كانت غيرها فالظاهر وجوب التصدق بأعيانها أيضا (قوله: سقط عنه المطالبة إلخ) كأنه والله تعالى أعلم؛ لأنه بمنزلة المال الضائع والفقراء مصرفه عند جهل أربابه، وبالتوبة يسقط إثم الإقدام على الظلم ط. اهـ

 

روى الإمام ابو داود، فقال: حدثنا محمد بن العلاء، أخبرنا ابن إدريس، أخبرنا عاصم بن كليب، عن أبيه عن رجل من الأنصار، قال:  خرجنا مع رسول الله -صلى الله عليه وسلم- في جنازة، فرأيت رسول الله -صلى الله عليه وسلم- وهو على القبر يوصي الحافر: “أوسع من قبل رجليه، أوسع من قبل رأسه”، فلما رجع استقبله داعي امرأة، فجاء، وجيء بالطعام فوضع يده، ثم وضع القوم فأكلوا، ففطن آباؤنا ورسول الله -صلى الله عليه وسلم- يلوك لقمة في فمه، ثم قال: “أجد لحم شاة أخذت بغير إذن أهلها” فأرسلت المرأة: يا رسول الله، إني أرسلت إلى النقيع تشترى لي شاة، فلم أجد، فارسلت إلى جار لي قد اشترى شاة: أن أرسل بها إلي بثمنها فلم يوجد، فأرسلت إلى امرأته، فأرسلت إلي بها، فقال رسول الله -صلى الله عليه وسلم-: “أطعميه الأسارى” –سنن ابي داود، رقم: 3332؛ ط. دار الرسالة العالمية، ت: شعَيب الأرنؤوط – محَمَّد كامِل قره بللي

قال الشيخ شعيب الأرنؤوط رحمه الله تعالى في تحقيقه: إسناده قوي من أجل عاصم بن كليب – وهو ابن شهاب- فهو وأبوه صدوقان لا بأس بهما. ابن إدريس: هو عبد الله. وأخرجه محمد بن الحسن الشيباني في “الآثار” كما في “نصب الراية” 4/ 168، وأحمد (22509) و (23465)، والطحاوي في “شرح مشكل الآثار” (3005) و (3006) وفي “شرح معاني الأثار” 4/ 208، والدارقطنى (4763) و (4764) و (4765)، والبيهقي في “السنن” 5/ 335، وفي “الدلائل” 6/ 310 من طرق عن عاصم بن كليب، به. اهـ

قال الإمام محمد رحمه الله تعالى (كتاب الآثار 750، 752، ط. دار النوادر:

 

 

قال الإمام أبو جعفر الطحاوي رحمه الله تعالى (321هـ): ففي هذا الحديث أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر بإطعام الشاة الأسارى- وهم ممن تجوز الصدقة عليهم بمثلها، ولم يأمر بحبسها للذي ذبحت وهي على ملكه ليأخذها  وهي كذلك؛ وفي ذلك ما قد دل على ارتفاع ملكه عنها  وعلى وقوع ملك من أحدث فيها ما أحدث من الذبح والشي عليها- كما يقول ذلك من يقوله من أهل العلم، منهم: أبو حنيفة وأصحابه. اهـ شرح مشكل الآثار، رقم الحديث: 3006، ط. الرسالة

وقال: فتنزه رسول الله صلى الله عليه وسلم عن أكلها ولم يأمر بطرحها بل أمرهم بالصدقة بها- إذ أمرهم أن يطعموها الأسارى. فهذا حكم رسول الله صلى الله عليه وسلم في اللحم الحلال إذا غصب فاستهلك. اهـ شرح معانى الآثار، رقم الحديث: 6408، ط. عالم الكتب

عن سعيد بن زيد، عن النبي – صلى الله عليه وسلم – قال: “من أحيا أرضا ميتة فهي له، وليس لعرق ظالم حق” –سنن ابي داود، رقم: 3073؛ ط. دار الرسالة العالمية، ت: شعَيب الأرنؤوط – محَمَّد كامِل قره بللي، قال الشيخ شعَيب الأرنؤوط رحمه الله تعالى: إسناده صحيح … وحسنه الترمذي (1433). اهـ

روى ابو داود فقال: حدثنا إبراهيم بن مروان، حدثنا أبي، حدثنا مسلم بن خالد الزنجي، حدثنا هشام بن عروة، عن أبيه عن عائشة: أن رجلا ابتاع غلاما، فأقام عنده ما شاء الله أن يقيم، ثم وجد به عيبا، فخاصمه إلى النبي -صلى الله عليه وسلم-، فردة عليه، فقال الرجل: يا رسول الله قد استغل غلامي، فقال رسول الله – صلى الله عليه وسلم -: “الخراج بالضمان”. قال أبو داود: هذا إسناد ليس بذاك. –سنن ابي داود، رقم: 3510؛ ط. دار الرسالة العالمية، ت: شعَيب الأرنؤوط – محَمَّد كامِل قره بللي، قال الأرنؤوط رحمه الله تعالى: حديث حسن. اهـ

وروى الترمذي رحمه الله تعالى، فقال: حدثنا محمد بن المثنى قال: حدثنا عثمان بن عمر، وأبو عامر [ص:574] العقدي، عن ابن أبي ذئب، عن مخلد بن خفاف، عن عروة، عن عائشة، «أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى أن الخراج بالضمان»: هذا حديث حسن صحيح، وقد روي هذا الحديث من غير هذا الوجه، والعمل على هذا عند أهل العلم –سنن الترمذي، رقم: 1285؛ ط. شركة مكتبة ومطبعة مصطفى البابي الحلبي – مصر

قال الشوكاني رحمه الله تعالى (1250هـ): فوائد العين المغصوبة تابعة لها فكما يجب رد العين المغصوبة إلى المالك كذلك يجب رد فوائدها إليه ومن خالف في هذا فليس بيده رواية ولا دراية وأما الاستدلال بحديث الخراج بالضمان فلا يخفاك أنه وارد في مقبوضة  بإذن الشرع فكيف يصح الحاق العين المغصوبة بها ومعلوم أن الغاصب ضامن على كل حال فكيف يستحق عوضا وهو الخراج في مقابلة ضمانه وبالجملة فهذا من وضع الدليل في غير موضعه … فيالله العجب من مثل هذه المقالات التي يمجها السمع ويردها العقل والشرع. –السيل الجرار، ج: 1، ص: 656-657، ط. دار ابن حزم

قال المرغيناني رحمه الله تعالى (593هـ): قال: “ومن غصب ألفا فاشترى بها جارية فباعها بألفين ثم اشترى بالألفين جارية فباعها بثلاثة آلاف درهم فإنه يتصدق بجميع الربح، وهذا عندهما” وأصله أن الغاصب أو المودع إذا تصرف في المغصوب أو الوديعة وربح لا يطيب له الربح عندهما، خلافا لأبي يوسف، وقد مرت الدلائل وجوابهما في الوديعة أظهر؛ لأنه لا يستند الملك إلى ما قبل التصرف لانعدام سبب الضمان فلم يكن التصرف في ملكه.

ثم هذا ظاهر فيما يتعين بالإشارة، أما فيما لا يتعين كالثمنين فقوله في الكتاب “اشترى بها” إشارة إلى أن التصدق إنما يجب إذا اشترى بها ونقد منها الثمن. أما إذا أشار إليها ونقد من غيرها أو نقد منها وأشار إلى غيرها أو أطلق إطلاقا ونقد منها يطيب له، وهكذا قال الكرخي؛ لأن الإشارة إذا كانت لا تفيد التعيين لا بد أن يتأكد بالنقد ليتحقق الخبث. وقال بعض مشايخنا رحمهم الله: لا يطيب له قبل أن يضمن، وكذا بعد الضمان بكل حال، وهو المختار لإطلاق الجواب في الجامعين والمبسوط.

قال: “وإن اشترى بالألف جارية تساوي ألفين فوهبها أو طعاما فأكله لم يتصدق بشيء”، وهذا قولهم جميعا؛ لأن الربح إنما يتبين عند اتحاد الجنس. –الهداية، ج: 4، ص: 298-299، ط. دار احياء التراث العربي – بيروت – لبنان

قال الكاساني رحمه الله تعالى (ت 587هـ): (وأما) صفة الملك الثابت للغاصب في المضمون: فلا خلاف بين أصحابنا في أن الملك الثابت له يظهر في حق نفاذ التصرفات، حتى لو باعه، أو وهبه، أو تصدق به قبل أداء الضمان ينفذ، كما تنفذ هذه التصرفات في المشترى شراء فاسدا، واختلفوا في أنه هل يباح له الانتفاع به بأن يأكله بنفسه، أو يطعمه غيره قبل أداء الضمان، فإذا حصل فيه فضل هل يتصدق بالفضل؟ قال أبو حنيفة – رضي الله عنه – ومحمد – رحمه الله -: لا يحل له الانتفاع، حتى يرضي صاحبه، وإن كان فيه فضل يتصدق بالفضل، وقال أبو يوسف – رحمه الله -: يحل له الانتفاع ولا يلزمه التصدق بالفضل إن كان فيه فضل، وهو قول الحسن وزفر رحمهما الله وهو القياس، وقول أبي حنيفة ومحمد رحمهما الله استحسان.

(وجه) القياس أن المغصوب مضمون لا شك فيه، وهو مملوك للغاصب من وقت الغصب على أصل أصحابنا، فلا معنى للمنع من الانتفاع وتوقيف الحل على رضا غير المالك، كما في سائر أملاكه، ويطيب له الربح؛ لأنه ربح ما هو مضمون ومملوك، وربح ما هو مضمون غير مملوك يطيب له عنده لما نذكر، فربح المملوك المضمون أولى.

(وجه) الاستحسان ما روي أنه – عليه الصلاة والسلام – أضافه قوم من الأنصار فقدموا إليه شاة مصلية فجعل – عليه الصلاة والسلام – يمضغه ولا يسيغه، فقال – عليه الصلاة والسلام -: «إن هذه الشاة لتخبرني أنها ذبحت بغير حق، فقالوا: هذه الشاة لجار لنا ذبحناها لنرضيه بثمنها، فقال – عليه الصلاة والسلام – أطعموها الأسارى»، أمر – عليه الصلاة والسلام – بأن يطعموها الأسارى ، ولم ينتفع به ولا أطلق لأصحابه الانتفاع بها، ولو كان حلالا طيبا لأطلق مع خصاصتهم وشدة حاجتهم إلى الأكل، ولأن الطيب لا يثبت إلا بالملك المطلق.

وفي هذا الملك شبهة العدم؛ لأنه يثبت من وقت الغصب بطريق الاستناد، والمستند يظهر من وجه ويقتصر على الحال من وجه، فكان في وجوده من وقت الغصب شبهة العدم، فلا يثبت به الحل والطيب، ولأن الملك من وجه حصل بسبب محظور، أو وقع محظورا بابتدائه، فلا يخلو من خبث، ولأن إباحة الانتفاع قبل الإرضاء يؤدي إلى تسليط السفهاء على أكل أموال الناس بالباطل، وفتح باب الظلم على الظلمة، وهذا لا يجوز.

… وعلى هذا يخرج ما إذا غصب ألفا فاشترى جارية فباعها بألفين، ثم اشترى بالألفين جارية فباعها بثلاثة آلاف أنه يتصدق بجميع الربح في قولهما، وعند أبي يوسف – رحمه الله – لا يلزمه التصدق بشيء؛ لأنه ربح مضمون مملوك؛ لأنه عند أداء الضمان يملكه مستندا إلى وقت الغصب ومجرد الضمان يكفي للطيب، فكيف إذا اجتمع الضمان والملك وهما يقولان الطيب كما لا يثبت بدون الضمان لا يثبت بدون الملك من طريق الأولى، وفي هذا الملك شبهة العدم على ما بينا فيما تقدم، فلا يفيد الطيب.

… وعلى هذا يخرج ما إذا خلط المستودع إحدى الوديعتين بالأخرى خلطا لا يتميز: أن المخلوط يصير ملكا له عند أبي حنيفة – رحمه الله – لكن لا يطيب له، حتى يرضي صاحبه على ما نذكره إن شاء الله تعالى.

ولو اشترى بالدراهم المغصوبة شيئا هل يحل له الانتفاع به أو يلزمه التصدق؟ .

ذكر الكرخي – رحمه الله – وجعل ذلك على أربعة أوجه: إما أن يشير إليها وينقد منها، وإما أن يشير إليها وينقد من غيرها، وإما أن يشير إلى غيرها وينقد منها، وإما أن يطلق إطلاقا وينقد منها، وإذا ثبت الطيب في الوجوه كلها، إلا في وجه واحد وهو أن يجمع بين الإشارة إليها والنقد منها، وذكر أبو نصر الصفار والفقيه أبو الليث رحمهما الله أنه يطيب في الوجوه كلها، وذكر أبو بكر الإسكاف – رحمه الله – أنه لا يطيب في الوجوه كلها وهو الصحيح.

(وجه) قول أبي نصر وأبي الليث رحمهما الله تعالى أن الواجب في ذمة المشتري دراهم مطلقة، والمنقودة بدل عما في الذمة، أما عند عدم الإشارة فظاهر، وكذا عند الإشارة؛ لأن الإشارة إلى الدراهم لا تفيد التعيين، فالتحقت الإشارة إليها بالعدم، فكان الواجب في ذمته دراهم مطلقة، والدراهم المنقودة بدلا عنها، فلا يخبث المشترى، والكرخي كذلك يقول: إذا لم تتأكد الإشارة بمؤكد وهو النقد منها فإذا تأكدت بالنقد منها تعين المشار إليه، فكان المنقود بدل المشترى، فكان خبيثا.

(وجه) قول أبي بكر أنه استفاد بالحرام ملكا من طريق الحقيقة، أو الشبهة فيثبت الخبث، وهذا لأنه إن أشار إلى الدراهم المغصوبة فالمشار إليه إن كان لا يتعين في حق الاستحقاق يتعين في حق جواز العقد بمعرفة جنس النقد وقدره، فكان المنقود بدل المشترى من وجه نقد منها، أو من غيرها. وإن لم يشر إليها ونقد منها، فقد استفاد بذلك سلامة المشترى فتمكنت الشبهة فيخبث الربح، وإطلاق الجواب في الجامعين والمضاربة دليل صحة هذا القول، ومن مشايخنا من اختار الفتوى في زماننا بقول الكرخي تيسيرا للأمر على الناس لازدحام الحرام، وجواب الكتب أقرب إلى التنزه والاحتياط، والله تعالى أعلم. ولأن دراهم الغصب مستحقة الرد على صاحبها، وعند الاستحقاق ينفسخ العقد من الأصل، فتبين أن المشترى كان مقبوضا بعقد فاسد، فلم يحل الانتفاع به. –بدائع الصنائع، ج: 7، ص: 153-155، ط. دار الكتب العلمية

قال فخر الدين الزيلعي رحمه الله تعالى (المتوفى: 743 هـ): وأما الثاني، وهو ما إذا تصرف في المغصوب أو الوديعة وربح فهو على وجوه إما أن يكون ما يتعين بالتعيين كالعروض أو لا يتعين كالنقدين، فإن كان مما يتعين لا يحل له التناول منه قبل ضمان القيمة وبعده يحل إلا فيما زاد على قدر القيمة، وهو الربح المذكور هنا فإنه لا يطيب له ويتصدق به؛ لأن العقد يتعلق فيما يتعين حتى ينفسخ العقد بالهلاك قبل القبض فتمكن الخبث فيه.

وإن كان مما لا يتعين فقد قال الكرخي: إنه على أربعة أوجه أما إن أشار إليه ونقد منه أو أشار إليه ونقد من غيره أو أطلق إطلاقا ونقد منه أو أشار إلى غيره ونقد منه، وفي كل ذلك يطيب له إلا في الوجه الأول، وهو ما إذا أشار إليه ونقد منه؛ لأن الإشارة إليه لا تفيد التعيين فيستوي وجودها، وعدمها إلا إذا تأكد بالنقد منها.

وقال مشايخنا: – رحمهم الله – لا يطيب بكل حال أن يتناول منه قبل أن يضمن وبعد الضمان لا يطيب الربح بكل حال، وهو المختار، وإطلاق الجواب في الجامعين والمضاربة يدل على ذلك ووجهه أنه بالنقد منه استفاد سلامة المشتري وبالإشارة استفاد جواز العقد لتعلق العقد به في حق القدر والوصف فتثبت فيه شبهة الحرمة لملكه بسبب خبيث واختار بعضهم الفتوى على قول الكرخي في زماننا لكثرة الحرام، وهذا كله على قولهما، وعند أبي يوسف – رحمه الله – لا يتصدق بشيء منه، والوجه ما بينا. –تبيين الحقائق، ج: 5، ص: 226، ط. المطبعة الكبرى الأميرية – بولاق، القاهرة

قال شمس الأئمة السرخسي (ت 483هـ) رحمه الله تعالى: وإذا كان عند الرجل وديعة – دراهم أو دنانير، أو شيء من المكيل، أو الموزون – فأنفق طائفة منهما في حاجته: كان ضامنا لما أنفق منها – اعتبارا للبعض بالكل – ولو لم يصر ضامنا لما بقي منها؛ لأنه في الباقي حافظ للمالك، وبما أنفق لم يتعيب الباقي، فإن هذا مما لا يضره التبعيض، فهو كما لو أودعه وديعتين، فأنفق إحداهما: لا يكون ضامنا للأخرى، فإن جاء بمثل ما أنفق، فخلطه بالباقي، صار ضامنا لجميعها؛ لأن ما أنفق صار دينا في ذمته، وهو لا ينفرد بقضاء الدين بغير محضر من صاحبه، فيكون فعله هذا خلطا لما بقي بملك نفسه، وذلك موجب للضمان عليه، فإن كان حين أنفق بعضها وجاء، بمثله فخلط بالباقي أفتي بأنه صار ضامنا لها كلها، فباعها ثم جاء رب الوديعة فضمنها إياه، وفي الثمن فضل قال: يطيب له حصة ما خلطه بها من ماله من الفضل؛ لأنه ربح حصل على ملكه وضمانه، ويتصدق بحصة الثاني من الوديعة في قول أبي حنيفة ومحمد رحمهما الله، وفي قول أبي يوسف – رحمه الله -: لا يتصدق به؛ لأنه بالضمان قد ملكه، مستندا إلى وقت وجوب الضمان، ولهذا نفذ بيعه، فكان هذا ربحا حاصلا على ملكه وضمانه، فيطيب له كما في حصة ملكه، وهما يقولان: هذا ربح حصل له بكسب خبيث، فإنه ممنوع من بيع الوديعة، إما لبقاء ملك المودع – كما في الباقي بعد الخلط في إحدى الروايتين، أو لبقاء حقه على ما قلنا – والربح الحاصل بكسب خبيث سبيله التصدق به، ولأن المودع عند البيع يخبر المشتري أنه يبيع ملكه وحقه، وهو كاذب في ذلك، والكذب في التجارة يوجب الصدقة؛ بدليل حديث قيس بن عروة الكناني قال: «كنا نتبايع في الأسواق بالأوساق ونسمي أنفسنا السماسرة، فدخل علينا رسول الله – صلى الله عليه وسلم – وسمانا بأحسن الأسماء وقال: يا معشر التجار، إن تجارتكم هذه يحضرها اللغو والكذب؛ فشوبوها بالصدقة». فعملنا بالحديث في إيجاب التصدق بالفضل.

وهذا إذا كانت الوديعة شيئا يباع. فإن كانت دراهم: فالدراهم يشترى بها، ثم ينظر: إن اشترى بها بعينها ونقدها، لا يطيب له الفصل أيضا، وإن اشترى بها، ونقد غيرها، أو اشترى بدراهم مطلقة، ثم نقدها: يطيب له الربح هنا؛ لأن الدراهم لا تتعين بنفس العقد، ما لم ينضم إليه التسليم. ولهذا لو أراد أن يسلم غيرها كان له ذلك، فأما بالقبض يتعين نوع تعين، ولهذا لا يملك استرداد المقبوض من البائع ليعطيه مثلها؛ فلهذا قلنا: إذا استعان في العقد والنقد جميعا بالدراهم الوديعة أو المغصوبة، لا يطيب له الفضل، وكذلك إن اشترى بها مأكولا ونقدها، لم يحل له أن يأكل ذلك قبل أداء الضمان. ولو اشترى بدراهم مطلقة ثم نقد تلك الدراهم: حل له أن ينتفع بها.

وفي النوادر: لو اشترى دينارا بعشرة دراهم، ونقد الدراهم المغصوبة: لم يحل له أن ينتفع بالدينار، ما لم يؤد الضمان؛ لأن صاحب الدراهم إذا استحق دراهمه فسد العقد، ووجب عليه رد الدينار، فكانت كالمقبوض بحكم عقد فاسد. بخلاف ما لو نقدها في ثمن الطعام؛ لأنه بالاستحقاق هناك لا يبطل الشراء، بل يبقى الثمن دينا في ذمته – كما كان -. وعلى هذا قالوا: لو غصب ثوبا واشترى به جارية، لم يحل له أن يطأها؛ لأنه لو استحق الثوب لزمه رد الجارية، ولو تزوج بالثوب المغصوب امرأة: حل له أن يطأها؛ لأن المغصوب منه إذا استحق الثوب، لا يبطل النكاح ولا التسمية. –المبسوط للسرخسي، ج: 11، ص: 111-112، ط. دار المعرفة – بيروت

قال برهان الدين محمود بن أحمد بن عبد العزيز بن عمر بن مَازَه البخاري الحنفي (المتوفى: 616هـ) رحمه الله تعالى:  اشترى بدراهم مغصوبة أو بدراهم اكتسبها من الحرام شيئاً، فهذا على وجوه:

أما إن دفع إلى البائع تلك الدراهم أولاً ثم اشترى منه بتلك الدراهم،

أو اشترى قبل الدفع بتلك الدراهم ودفعها،

أو اشترى قبل الدفع بتلك الدراهم ودفع غير تلك الدراهم،

أو اشترى مطلقاً ودفع تلك الدراهم،

أو اشترى بدراهم أخر ودفع تلك الدراهم،

وفي الوجوه كلها لا يطيب له التناول قبل ضمان الدراهم، وبعد الضمان لا يطيب له الربح؛ هكذا ذكر في «الجامع الصغير»

قال أبو الحسن الكرخي: هذا الجواب صحيح في الوجه الأول والثاني، وأما في الوجه الثالث والرابع والخامس فلا، واليوم الفتوى على قول أبي الحسن لكثرة الحرام دفعاً للحرج عن الناس، وعلى هذا تقرر رأي الشيخ الإمام الأجل الشهيد –المحيط البرهاني، ج: 5، ص: 499، ط. دار الكتب العلمية، بيروت – لبنان

قال العلامة فريد الدين عالم بن العلاء الدهلوي (786هـ) رحمه الله تعالى فى التتارخانية (ج: 16، ص: 510، ط. زكريا):

 

قال السُّغْدي رحمه الله تعالى (المتوفى: 461هـ): وَلَو غصب دَرَاهِم أَو دَنَانِير أَو غير ذَلِك من الكيلى والوزني فاتجر فِيهِ وَربح فانه يتَصَدَّق بِالرِّبْحِ فِي الافضل وَلَيْسَ بِالْوَاجِبِ –النتف فى الفتاوى، ج: 2، ص: 738، ط. الرسالة

قال الحصكفى رحمه الله تعالى (ت 1088هـ)  فى الدر المنتقى –المطبوع مع مجمع الأنهر، ج: 4، ص: 83، ط. العلمية : وفى الذخيرة: الفتوى اليوم على قول الكرخي –دفعا للحرج عن الناس، وبه كان يفتى الإمام ابو الليث، واعتمده فى التنوير. اهـ

وقال الحصكفى رحمه الله تعالى فى الدر المختار –على صدر رد المحتار، ج: 6، ص: 189-190، ط. دار الفكر-بيروت: (كما لو تصرف في المغصوب الوديعة) بأن باعه (وربح) فيه (إذا كان) ذلك (متعينا بالإشارة أو بالشراء بدراهم الوديعة أو الغصب ونقدها) يعني يتصدق بربح حصل فيهما إذا كانا مما يتعين بالإشارة وإن كانا مما لا يتعين فعلى أربعة أوجه فإن أشار إليها ونقدها فكذلك يتصدق (وإن أشار إليها ونقد غيرها أو) أشار (إلى غيرها) ونقدها (أو أطلق) ولم يشر (ونقدها لا) يتصدق في الصور الثلاث عند الكرخي قيل (وبه يفتى) والمختار أنه لا يحل مطلقا كذا في الملتقى ولو بعد الضمان هو الصحيح كما في فتاوى النوازل واختار بعضهم الفتوى على قول الكرخي في زماننا لكثرة الحرام وهذا كله على قولهما. وعند أبي يوسف لا يتصدق بشيء منه كما لو اختلف الجنس ذكره الزيلعي فليحفظ. اهـ

قال ابن عابدين رحمه الله تعالى (1252هـ) تحته: (قوله الوديعة) أي بغير إذن المالك (قوله إذا كان متعينا بالإشارة) وذلك كالعروض فلا يحل له الربح أي ولو بعد ضمان القيمة قال الزيلعي: فإن كان مما يتعين لا يحل له التناول منه قبل ضمان القيمة وبعده يحل إلا فيما زاد على قدر القيمة، وهو الربح فإنه لا يطيب له ويتصدق به وفي القهستاني، وله أن يؤديه إلى المالك، ويحل له التناول لزوال الخبث (قوله أو بالشراء) لا محل للعطف هنا ولذا قال ط الأخصر الأوضح أن يقول: أو غير متعين ونقده (قوله يعني يتصدق بربح) تفسير للتشبيه في قوله كما لو تصرف وبيان لما بعده بعبارة أوضح

(قوله فعلى أربعة أوجه) زاد في التتارخانية عن المحيط خامسا، وهو ما إذا دفعها إلى البائع ثم اشترى وحكمه كالأول (قوله فكذلك يتصدق) ؛ لأن الإشارة إليه لا تفيد التعيين، فيستوي وجودها وعدمها إلا إذا تأكد بالنقد منها زيلعي (قوله أو أطلق) بأن قال اشتريت بألف درهم ونقد من دراهم الغصب أو الوديعة عزمية. وفي التتارخانية عن الذخيرة أنه إذا أطلق ولم يشر، فإن نوى النقد منها فلا يخلو إن حقق نيته فنقد منها، فالأصح أنه لا يطيب، وإن لم يحقق نيته بطيب،؛ لأن مجرد العزم لا أثر له، وإن لم ينو ثم نقد منه طاب قال الحلواني: إنما يطيب إذا نوى أن لا ينقد منها ثم بدا له فنقد أما إذا نوى النقد منها مع علمه أنه ينقد لا يطيب اهـ ملخصا.

وفي البزازية وقول الكرخي عليه الفتوى ولا تعتبر النية في الفتوى ثم حمل ما مر على حكم الديانة (قوله قيل وبه يفتى) قاله في الذخيرة وغيرها كما في القهستاني، ومشى عليه في الغرر ومختصر الوقاية والإصلاح، ونقله في اليعقوبية عن المحيط، ومع هذا لم يرتضه الشارح فأتى بقيل لما في الهداية. قال مشايخنا لا يطيب قبل أن يضمن وكذا بعد الضمان بكل حال وهو المختار لإطلاق الجواب في الجامعين والمضاربة: أي كتاب المضاربة من المبسوط واني على الدرر.

قال الزيلعي: ووجهه أن بالنقد منه استفاد سلامة المشرى، وبالإشارة استفاد جواز العقد، لتعلق العقد به في حق القدر والوصف، فيثبت فيه شبهة الحرمة لملكه بسبب خبيث (قوله مطلقا) أي في الأوجه الأربعة (قوله واختار بعضهم إلخ) هذا من كلام الزيلعي المعزو آخر العبارة وأتى به، وإن علم مما مر لإشعار هذا التعبير بعدم اعتماده ففيه تأييد لتعبيره بقيل مخالفا لما جزم به المصنف، ولكن لا يخفى أنهما قولان مصححان (قوله كما لو اختلف الجنس) قال الزيلعي: وهذا الاختلاف بينهم فيما إذا صار بالتقلب من جنس ما ضمن بأن ضمن دراهم مثلا وصار في يده من بدل المضمون دراهم، ولو طعام أو عروض لا يجب عليه التصدق بالإجماع؛ لأن الربح إنما يتبين عند اتحاد الجنس، وما لم يصر بالتقلب من جنس ما ضمن لا يظهر الربح اهـ

قال البزازي الكردري رحمه الله تعالى (827هـ): اشترى بدراهم مغصوبة: إن دفعها أولا للبائع ثم اشترى بها، أو قبل الدفع أشار إليها ونقد منها: لا يطيب الأكل فيهما قبل الضمان، وبعد الضمان لا يطيب الربح فى المختار للفتوى. وفيما بقي من الصور يطيب، وهو قول الكرخي، وعليه الفتوى. ولا يعتبر النية فى الفتوى. –الفتاوى البزازية، ج: 3، ص: 96، ط. دار الفكر

وقال في نفس الصفحة: من له دراهم فيها خبث أراد الشراء بها على وجه يطيب له المشترى: يشترى أولا ولا يعين ولا يضيف ثم ينقد منها. قال الحلواني: إن نوى أن ينقد منها وحقق ما نوى –بأن نقد منها: اختلفوا فيه؛ والأصح أنه لا يطيب.

وقد مر خلافه.

ويمكن أن يقال: لا يخالفه، لأن السابق حكم الفتوى، وهذا حكم الديانة والتقوى.

وإن لم يحقق نيته: يطيب إجماعا.

فإن اشترى ولم يضف ولم يعين ولم ينو النقد منها: حل وطاب.

وإن نوى أن لا ينقد منها مع علمه أنه ينقد منه: لا يطيب. اهـ

في آب كي مسائل- للمفتي يوسف اللدهيانوي رحمه الله تعالى، 6\40، ط. مكتبه لدهيانوي:

 

قال المفتي تقي العثماني مد ظله في فقه البيوع، ج: 2، ص: 1012-1013، ط. مكتبة معارف القرآن، كراتشي:

 

وقال (2\1016):

 

# ويراجع أيضا: مجلة الكوثر الشهرية، العدد: 4\2014م، رقم السؤال: 3080 وفتاوى إمداد العلوم فريداباد، ص: 171

# بعض الفتاوى من مشايخ العرب في هذا الصدد المحصلة من شبكة المعلومات:

اسلام ويب

https://www.islamweb.net/ar/fatwa/18275/

الفتوى

الرئيسية فقه المعاملات قضايا مالية معاصرة التخلص من المال الحرام

المال الحرام…أنواعه..وحكم الربح الناشئ منه

رقم الفتوى: 18275

تاريخ النشر:الثلاثاء 15 ربيع الآخر 1423 هـ – 25-6-2002 م

التقييم: 26148

السؤال

السلام عليكم ورحمة الله وبركاته ، وبعد:السؤال : رجل أصل ماله كله حرام ، ونماه في الحرام بالقرض بالربا ، وبالتجارة المحرمة ما يزيد على ستين سنة ،وأقنعناه بالتوبة أخيراً ، لكنه يسأل كيف تكون توبته وقد مرت كل هذه السنين، ومات من مات من تعامل معه بالحرام، ولا يعرف كثيرا من أصحاب الأموال . . . نرجو إجابة عاجلة وجزاكم الله خيراً.

الإجابــة

الحمد لله والصلاة والسلام على رسول الله وعلى آله وصحبه أما بعد:

فمن اكتسب مالاً من حرام فالواجب عليه التوبة، ومن شروط التوبة التخلص من هذا المال الحرام.

والمال الحرام إما أن يكون قد أخذ من صاحبه جبراً عنه وبغير رضى واختيار منه كالمال المسروق والمغصوب، ومن ذلك الفائدة الربوية الزائدة على رأس المال التي تؤخذ من المقترض، فإن الله عز وجل قد سماها ظلماً وإن أخذت برضى المقترض، وإما أن يكون هذا المال قد أخذ منه بإرادته ورضاه أي يكون المعطي والآخذ قد اشتركا في ارتكاب الفعل المحرم.

أما النوع الأول: وهو ما أخذ من صاحبه ظلماً، فالواجب رده إلى صاحبه إن علمه، أو إلى وارثه إن كان قد مات، فإن لم يعلمه تصدق به عنه.

أما النوع الثاني: وهو ما أخذ من صاحبه برضاه ولم يعتبره الشارع ظلماً، فالواجب أن يصرفه في مصالح المسلمين على القول الراجح من أقوال أهل العلم في هذه المسألة، وهو قول الحنفية وقول عند المالكية وأحد القولين عند الحنابلة.

وبقيت مسألتان:

الأولى: إذا لم يعرف قدر الحرام حتى يخرجه كيف يفعل؟

والجواب: ما قاله النووي -رحمه الله- في شرح المهذب : 9/428

قال: (فرع) من ورث مالاً ولم يعلم من أين كسبه مورثه؟ أمن حلال أم من حرام ولم تكن علامة؟ فهو حلال بإجماع العلماء، فإن علم أن فيه حراماً وشك في قدره أخرج قدر الحرام بالاجتهاد. انتهى كلامه رحمه الله.

فالواجب إذاً أن يتحرى ويجتهد بقدر الاستطاعة فما غلب على ظن أنه من الحرام أخرجه.

والمسألة الثانية: الأرباح الناشئة من المال الحرام ما حكمها؟

والجواب: أن في ذلك خلافا طويلا بين أهل العلم، فمنهم من يرى أن الأرباح تابعة للجهد والعمل فتكون ملكاً لهذا العامل الذي استثمرها وهذا مذهب الشافعية والمالكية، ودليلهم على ذلك حديث عائشة رضي الله عنها الذي رواه أبو داود وغيره وسنده حسن، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: الخراج بالضمان.

فطالما أنه كان ضامناً لهذا المال فخراجه له.

ولا شك أن من أراد الورع تخلص من الحرام ومتعلقاته.

والله أعلم.

الاسلام سوال جواب

https://islamqa.info/ar/answers/126045/%D9%83%D8%B3%D8%A8-%D9%85%D8%A7%D9%84%D8%A7-%D8%AD%D8%B1%D8%A7%D9%85%D8%A7-%D8%AB%D9%85-%D8%AA%D8%A7%D8%A8-%D9%88%D8%B9%D9%85%D9%84-%D9%85%D8%B4%D8%B1%D9%88%D8%B9%D8%A7-%D8%AA%D8%AC%D8%A7%D8%B1%D9%8A%D8%A7-%D9%85%D9%86-%D8%A7%D9%84%D9%85%D8%A7%D9%84-%D8%A7%D9%84%D8%AD%D8%B1%D8%A7%D9%85

السؤال

أخي كان يعمل في كازينو لتقديم الخمور والمأكولات والمشروبات لكن نسبة الخمور تقريبا 75% من دخل المحل ودخله بعد فتره هداه الله فقرر ترك العمل والبحث عن عمل حلال لكنه جلس في المنزل قرابة السنة والنصف ومعه من المال الحرام تقريبا 13 ألف جنيه فقرر فتح مشروع تجاري بناء علي فتوى بأنه مضطر وبعد ذلك يتخلص من راس المال وبالفعل اشتري محل إيجار جديد 5 سنوات شاركته أنا وأبي بمال حلال ، تقريبا 4 آلاف جنيه وبدا المحل في الربح وبعد فتره بدأنا في التخلص من راس المال بجدول ثابت وبعدما كثر الربح فكرنا في شراء محل تمليك بمساعده صديق أبي (أخي الثلث وأنا وأبي الثلث وصديق أبي الثلث) وذات يوم سمعت من بعض المشايخ أنه لا بد أن نتخلص من راس المال + الربح فخفت خوفا شديدا علينا فحاولت البحث عن مخرج بأي حال فقررت شراء نصيب أخي من المحل الإيجار جديد فاستلفت مالا من العمل و قمت ببيع ذهب زوجتي وحسبت نصيب أخي في المحل الإيجار واشتريته واخذ أخي مني المال وأنفقه في مصلحة المسلمين وجعلته يشتغل عندي كأجير السؤال الآن 1- هل برئت ذمتي أمام الله ؟ وما حكم هذا البيع ؟ وهل هناك شبه في مالي وبالذات أن أصله حلال ولو هنا شبه ماذا افعل ؟ 2- بالنسبة لأخي يعمل عندي الآن أجيراً وأعطيه أكثر من نصف الربح حتى يتخلص بمقدار نصيبه من المحل التمليك أيضا لأنه شريك معي الآن هل على أخي ذنب ؟ 3- هل ظروف أخي تجعله في حكم المضطر ؟ 4- لو كل ما فعلناه صحيحاً لماذا أخاف لما آكل من هذا المال على الرغم من أن راس مالي حلال ؟ أرجو الرد أيضا علي هذا السؤال للأهمية

نص الجواب

الحمد لله

من اكتسب مالاً بطريق محرم ، كالعمل في هذا الكازينو الذي يقدم الخمر ، أو العمل في كتابة الربا ، ونحو ذلك من الأعمال المحرمة ، ثم تاب إلى الله تعالى وندم على ما فعل ، فإن كان قد أنفق المال ، فلا شيء عليه ، وإن كان المال في يده ، فيلزمه التخلص منه بإنفاقه في أوجه الخير ، وإذا كان محتاجا فإنه يأخذ منه قدر الحاجة ، ويتخلص من الباقي

قال ابن القيم رحمه الله : ” إذا عاوض غيره معاوضة محرمة وقبض العوض ، كالزانية والمغني وبائع الخمر وشاهد الزور ونحوهم ثم تاب والعوض بيده … فتوبته بالتصدق به ولا يدفعه إلى من أخذه منه ، وهو اختيار شيخ الإسلام ابن تيمية وهو الصواب … “. انتهى بتصرف من “مدارج السالكين” (1/389).

وقد بسط ابن القيم الكلام على هذه المسألة في “زاد المعاد” (5/778) وقرر أن طريق التخلص من هذا المال وتمام التوبة إنما يكون : ” بالتصدق به ، فإن كان محتاجا إليه فله أن يأخذ قدر حاجته ، ويتصدق بالباقي ” انتهى

وقال شيخ الإسلام : ” فإن تابت هذه البغي وهذا الخَمَّار ، وكانوا فقراء جاز أن يصرف إليهم من هذا المال قدر حاجتهم ، فإن كان يقدر يتجر أو يعمل صنعة كالنسج والغزل ، أعطي ما يكون له رأس مال . وإن اقترضوا منه شيئا ليكتسبوا به … كان أحسن ” انتهى من “مجموع الفتاوى” (29/308).

وعلى هذا ؛ فيجوز أن يعطى التائب ما يكون رأس مال يتجر به ، سواء ردّه أو لا ، والأولى يردّه فيتخلص منه بإعطائه للفقراء والمساكين .

وهذا القول الذي نصره شيخ الإسلام وتلميذه ابن القيم ، هو القول الصواب الذي يتماشى مع مقاصد الشريعة في ترغيب الناس في التوبة وعدم تنفيرهم منها ، وفي توفير العمل للمحتاج ، وتقليل البطالة ، وأما القول بخلاف ذلك ، وإلزام التائب بالخروج من جميع ماله ، وتركه بلا مال ولا تجارة ، ففيه تعسير للتوبة ، وتنفير منها .

قال شيخ الإسلام رحمه الله : ” فإن الرجل قد يعيش مدة طويلة لا يصلي ولا يزكي ، وقد لا يصوم أيضا ، ولا يبالي من أين كسب المال أمن حلال أم من حرام ، ولا يضبط حدود النكاح والطلاق ، وغير ذلك ، فهو في جاهلية إلا أنه منتسب إلى الإسلام ، فإذا هداه الله وتاب عليه فإن أُوجب عليه قضاء جميع ما تركه من الواجبات ، وأُمر برد جميع ما اكتسبه من الأموال ، والخروج عما يحبه من الأبضاع إلى غير ذلك صارت التوبة في حقه عذابا ، وكان الكفر حينئذ أحب إليه من ذلك الإسلام الذي كان عليه ، فإن توبته من الكفر رحمة ، وتوبته وهو مسلم عذاب . وأعرف طائفة من الصالحين من يتمنى أن يكون كافرا ليُسلم فيغفر له ما قد سلف ؛ لأن التوبة عنده متعذرة عليه أو متعسرة على ما قد قيل له ، واعتقده من التوبة ، ثم هذا منفّر لأكثر أهل الفسوق عن التوبة ، وهو شبيه بالمؤيِّس للناس من رحمة الله ، ووضع الآصار الثقيلة والأغلال العظيمة على التائبين الذين هم أحباب الله ، فإن الله يحب التوابين ويحب المتطهرين ، والله أفرح بتوبة عبده من الواجد لماله الذي به قوامه بعد اليأس منه ” انتهى من “مجموع الفتاوى” (22/21).

وبناء على ذلك ؛ فما قام به أخوك من الاتجار بهذا المال المحرم ، ثم التخلص منه بعد أن رزقه الله ووسع عليه ، تصرف صحيح سديد ، ولا يلزمه التخلص من الربح الناتج عن هذا المال .

ولعل الشيخ الذي سمعته كان يتحدث عن المال المغصوب أو المسروق ، فإن نماء الغصب وربحه لا يملكه الغاصب عند بعض الفقهاء .

وكونك تخاف عند أكل شيء من هذا المال ، لا يضر ، ولا يؤثر على حكم المسألة ، فقد أحسنتم التصرف ، ونسأل الله تعالى أن يبارك في مالكم ، وأن يوسع أرزاقكم ، وأن يتقبل التوبة من أخيكم . والله أعلم.

من أخذ مالا حراما واستثمره فهل يطيب له الربح؟

https://islamqa.info/ar/answers/142235/%D9%85%D9%86-%D8%A7%D8%AE%D8%B0-%D9%85%D8%A7%D9%84%D8%A7-%D8%AD%D8%B1%D8%A7%D9%85%D8%A7-%D9%88%D8%A7%D8%B3%D8%AA%D8%AB%D9%85%D8%B1%D9%87-%D9%81%D9%87%D9%84-%D9%8A%D8%B7%D9%8A%D8%A8-%D9%84%D9%87-%D8%A7%D9%84%D8%B1%D8%A8%D8%AD

142235

تاريخ النشر : 16-01-2010

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السؤال

لقد ربحت مالا حراما واشتريت سيارة وإنني الآن أقوم بتأجير هذه السيارة للآخرين وأتربح منها . فهل هذا المال الذي أكتسبه من تأجير تلك السيارة حلال أم حرام؟ وماذا لو تربحت منها وفعلت الخير بالمال الذي أربحه منها . وهل يكون دخلي حلالا .

نص الجواب

الحمد لله

من اكتسب مالا حراما فلا يخلو :

1- أن يكون قد أخذه بمعاوضة محرمة كبيع شيء محرم ، أو أجرة على عمل محرم كشهادة الزور أو الغناء ، فهذا من توبته أن يتصدق بما في يده من هذا المال ، فإن كان محتاجا ووضع المال في تجارة أو سيارة يتكسب منها ، فنرجو ألا يكون عليه حرج في ذلك ، وإن استطاع أن يتصدق بقدر المال الحرام فهذا أفضل وأكمل لتوبته .

قال ابن القيم رحمه الله : ” إذا عاوض غيره معاوضة محرمة وقبض العوض ، كالزانية والمغني وبائع الخمر وشاهد الزور ونحوهم ثم تاب والعوض بيده . فقالت طائفة : يرده إلى مالكه ؛ إذ هو عين ماله ولم يقبضه بإذن الشارع ولا حصل لربه في مقابلته نفع مباح .

وقالت طائفة : بل توبته بالتصدق به ولا يدفعه إلى من أخذه منه ، وهو اختيار شيخ الإسلام ابن تيمية وهو أصوب القولين … “. انتهى من “مدارج السالكين” (1/389).

وقد بسط ابن القيم الكلام على هذه المسألة في “زاد المعاد” (5/778) وقرر أن طريق التخلص من هذا المال وتمام التوبة إنما يكون : ” بالتصدق به ، فإن كان محتاجا إليه فله أن يأخذ قدر حاجته ، ويتصدق بالباقي ” انتهى .

وينظر للفائدة جواب السؤال رقم (126045) .

2- وإن كان أخذه على وجه السرقة أو الغصب لزمه أن يرد المال إلى صاحبه مهما طال الزمن . وهل يرد الربح أيضا إن اتجر به؟ فيه خلاف بين الفقهاء .

فالحنابلة على أنه يرد الربح أيضا ، والمالكية والشافعية على أن الربح يكون للغاصب لأنه يضمنه في حال التلف والهلاك ، وذهب أبو حنيفة إلى أنه يتصدق به ، لأنه جاء بسبب خبيث.

قال ابن قدامة في المغني (5/ 159) : ” وإذا غصب أثمانا فاتجر بها , أو عروضا فباعها واتجر بثمنها , فقال أصحابنا : الربح للمالك , والسلع المشتراة له … قال الشريف : وعن أحمد أنه يتصدق به “.

وقال الشربيني الخطيب: ” لو اتجر الغاصب في المال المغصوب فالربح له في الأظهر ” انتهى من “مغني المحتاج” (3/ 363).

وينظر :  “الموسوعة الفقهية الكويتية” (22/ 84).

واختار شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله أن الغاصب يأخذ من الربح سهم المثل ، فيعامل كما لو أنه أخذ المال مضاربةً ، فيكون له نصف الربح أو ثلثه أو ربعه بحسب عرف الناس .

سئل الشيخ الدكتور خالد المشيقح حفظه الله : سرق شخص سيارة آخر ، وقام بالعمل عليها ، وكسب منها مبلغاً معيناً ، فتم القبض عليه ، فلمن يكون هذا المبلغ ، للسارق أم لصاحب السيارة؟

فأجاب : “هذا المبلغ موضع خلاف بين أهل العلم، والرأي المختار ما ذهب إليه شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله أنه إذا غصب دراهم ، واتجر بها فإن له سهم المثل ، بمعنى : أنه ينظر إلى هذا الشخص الذي عمل بهذه الدراهم ، فليأخذ عند أهل العرف والتجارة والخبرة بمثل هذه الأمور ، فإن قالوا : يأخذ نصف الكسب فيعطى النصف ، وإن قالوا : يأخذ الربع فيعطى الربع ، والباقي يكون للمالك .

فمثل هذا الذي عمل على هذه السيارة له سهم المثل ، فيعطى قيمة عمله ، فإذا كان مثله يأخذ النصف أو يأخذ الربع ، والباقي يرده على مالكه ، وورد ذلك عن عمر رضي الله تعالى عنه في قصة ابنه لما أخذ مالاً من بيت المال ، فاستشار عمر رضي الله تعالى عنه في ذلك ، فأشير عليه أن يجعله قِراضا ، يعني: مضاربة رواه مالك في الموطأ (1396).

والله أعلم” انتهى من فتاوى “موقع الإسلام اليوم”. والله أعلم .

আবু মুহাম্মাদ আব্দুল্লাহ আলমাহদি (আফাল্লাহু আনহু)

১৬-০১-১৪৪২ হি.

২৬-০৮-২০২১ ইং