ফাতওয়া  নং  ৯

সুন্নাত ঘরে পড়া উত্তম না মসজিদে?

সুন্নাত ঘরে পড়া উত্তম না মসজিদে?

সুন্নাত ঘরে পড়া উত্তম না মসজিদে?

প্রশ্ন:
মাননীয় মুফতি সাহেব। আমার জানার বিষয় হলো, কাবলাল জুমআর চার রাকাত সুন্নত এবং বা’দাল জুমআ চার রাকাত সুন্নাত ঘরে পড়া উত্তম না মসজিদে পড়া উত্তম? জানিয়ে বাধিত করবেন।

উত্তর:

الجواب باسم ملهم الصواب

সুন্নতে মুয়াক্কাদাসহ অন্যান্য নফল মূলত ঘরে পড়া উত্তম। এটিই শরীয়তের স্বাভাবিক বিধান। কিন্তু কয়েক কারণে মুফতিয়ানে কেরাম বর্তমানে সুন্নতে মুয়াক্কাদা মসজিদে পড়া উত্তম বলেছেন।
(ক) ঘরে পড়ে নিলে অনেকে ধারণা করতে পারেন, আপনি সুন্নত পড়েন না।
(খ) বর্তমানে কিছু কিছু লোক কোন কোন সুন্নত আদায় করে না। তাদের সাথে সাদৃশ্য থেকে বাঁচার জন্য মসজিদে পড়া উত্তম। তাছাড়া লোকজন না জেনে আপনাকেও ঐ শ্রেণীর লোক মনে করতে পারে। এ ধরনের বদ ধারণা থেকে বাঁচার জন্যও মসজিদে পড়া উত্তম।
(গ) বর্তমানে নামাজের ব্যাপারে মানুষের গাফলত অনেক বেশি। আবার অনেকের ঘরে নামাজের পরিবেশও নেই। সুন্নত না পড়ে মসজিদ থেকে বের হয়ে গেলে গাফলত বশত বা দুনিয়াবি ঝামেলায় জড়িয়ে অথবা ঘরে পরিবেশ না থাকার কারণে সুন্নত ছুটে যাওয়ার আশঙ্কা থাকে। তাই সুন্নত মসজিদে পড়ে নেয়াই উত্তম। তবে যেখানে এ ধরনের কোন সমস্যা না থাকবে, সেখানে ঘরে পড়াই উত্তম। তবে এক্ষেত্রেও যদি মসজিদে পড়লে খুশু-খুজু বেশি হয়, তাহলেও মসজিদে পড়া উত্তম হবে।

المراجع و المصادر
*الصحيح للامام البخاري: عن زيد بن ثابت : أن رسول الله صلى الله عليه و سلم اتخذ حجرة قال حسبت أنه قال من حصير في رمضان فصلى فيها ليالي فصلى بصلاته ناس من أصحابه فلما علم بهم جعل يقعد فخرج إليهم فقال قد عرفت الذي رأيت من صنيعكم فصلوا أيها الناس في بيوتكم فإن أفضل الصلاة صلاة المرء في بيته إلا المكتوبة. (رقم الحديث: 698) * الصحيح للامام مسلم: قال رسول الله -صلى الله عليه وسلم- « إذا قضى أحدكم الصلاة فى مسجده فليجعل لبيته نصيبا من صلاته فإن الله جاعل فى بيته من صلاته خيرا ». (رقم الحديث: 1858)

*السنن للامام أبي داود: عن زيد بن ثابت أن النبي صلى الله عليه و سلم قال ” صلاة المرء في بيته أفضل من صلاته في مسجدي هذا إلا المكتوبة ” (رقم الحديث: 1044)

* البحر الرائق 2/87: والأفضل في السنن أداؤها في المنزل إلا التراويح وقيل إن الفضيلة لا تختص بوجه دون وجه وهو الأصح لكن كل ما كان أبعد من الرياء وأجمع للخشوع والإخلاص فهو أفضل كذا في النهاية وفي الخلاصة في سنة المغرب إن خاف لو رجع إلى بيته شغله شأن آخر يأتي بها في المسجد وإن كان لا يخاف صلاها في المنزل وكذا في سائر السنن حتى الجمعة والوتر في البيت أفضل ا هـ.

* الدر المختار على صدر رد المحتار 2/22 (ط.سعيد): والأفضل في النفل غير التراويح المنزل إلا لخوف شغل عنها والأصح أفضلية ما كان أخشع وأخلص. اهـ

*و فى رد المحتار تحته: (قوله والأفضل في النفل إلخ) شمل ما بعد الفريضة وما قبلها … وحيث كان هذا أفضل يراعى ما لم يلزم منه خوف شغل عنها لو ذهب لبيته، أو كان في بيته ما يشغل باله ويقلل خشوعه، فيصليها حينئذ في المسجد لأن اعتبار الخشوع أرجح. اهـ

* الفتاوى الهندية : 1/172: الأفضل في السنن والنوافل المنزل لقوله عليه السلام { صلاة الرجل في المنزل أفضل إلا المكتوبة }. … فأما السنن التي بعد الفرائض فيأتي بها في المسجد في مكان صلى فيه فرضه والأولى أن يتخطى خطوة والإمام يتأخر عن مكان صلى فيه فرضه لا محالة . كذا في الكافي وذكر الحلواني الأفضل أن يؤدي كله في البيت إلا التراويح ، ومنهم من قال : يجعل ذلك أحيانا في البيت والصحيح أن كل ذلك سواء فلا تختص الفضيلة بوجه دون وجه ولكن الأفضل ما يكون أبعد من الرياء وأجمع للإخلاص والخشوع . اهـ

* معارف السنن 4/111: قال الشيخ- يعنى الكشميري رحمه الله-: ثم افتى ارباب الفتيا بأن الأفضل الأداء فى المسجد كيلا يلزم التشبه بتركها بالروافض حيث لا يأتون بها، ونظرا إلى تهاون أهل عصرنا يمكن أن يفتى بأداءها فى المسجد كيلا يتشاغلوا عنها فى البيوت. اهــــــ

* امداد الفتاوی 1/466-467: نیز ان سنتوں کا مسجد میں پڑھنا افضل ہے- بلکہ جمیع سنن مؤکدہ کا تاکہ اتہام یا تشبہ با اہل بدعت سے محفوظ رہے جوکہ تارکین ان سنن کے ہیں – قال سعيد احمد بالن بورى فى التعليق: اصل مذہب یہ ہے کہ سنن مؤکدہ کا گھر میں پڑھنا افضل ہے ۔۔۔ لیکن اب مسجد میں پڑھنا بدو وجہ افضل ہے۔ اول:۔ تشبیہ با اہل بدعت ۔ دوم :۔ لوگوں میں تہاون و سستی عام ہے، اور مشاغل روز افزوں ہیں اس لئے اندیشہ ہے یہ گھر میں نہ پڑھ سکیں۔

(7) فتاوی محمودیہ: 11/272 (8) رحیمیہ: 5/219 (9) حقانیہ: 3/256

فقط. والله تعالى اعلم بالصواب

আবু মুহাম্মাদ আব্দুল্লাহ আলমাহদী (হাফিযাহুল্লাহ)
১০-০৩-২০১৮ ইং