ফাতওয়া  নং  ০৮

হাসপাতালে রোগী পাঠিয়ে কমিশন নেওয়া কি জায়েজ হবে?

হাসপাতালে রোগী পাঠিয়ে কমিশন নেওয়া কি জায়েজ হবে?

হাসপাতালে রোগী পাঠিয়ে কমিশন নেওয়া কি জায়েজ হবে?

প্রশ্ন:
হাসপাতালে রোগী পাঠিয়ে কমিশন নেওয়া কি জায়েজ হবে?

 

উত্তর:
যে কোনো একটি ব্যবসার স্বাভাবিক নীতি হল, উন্নত গ্রাহকসেবা ও পণ্যের মান দিয়ে বাজারে প্রতিযোগিতামূলক ব্যবসা করা। এতে ক্রেতা বিক্রেতা বা সেবাদাতা ও সেবা গ্রহীতা উভয়ই লাভবান হয়। স্বল্পমূল্যে উন্নত সেবার পথ সুগম হয়। তাই স্বাভাবিক প্রয়োজনীয় প্রক্রিয়ার বাইরে মধ্যস্বত্বভোগীর অনুপ্রবেশ শুধু শরীয়তই নয় বরং একটি সুস্থ ও সুষম অর্থব্যবস্থায়ও কাম্য নয়।
তাছাড়া বর্তমান বাংলাদেশে চিকিৎসার মতো একটি মানবিক সেবা খাত যেভাবে অসহনীয় মাত্রায় ধোঁকা প্রতারণার স্বর্গরাজ্যে পরিণত হয়েছে, আমরা মনে করি নৈতিক বিপর্যয়ের পাশাপাশি এই কমিশন-বানিজ্যও তার প্রধানতম কারণ। সামান্য একটু চিন্তা করলেই যে কোনো ব্যক্তি বিষয়টি একেবারেই সহজে অনুমান করতে পারবেন যে, আপনার মতো ফার্মাসিস্টকেই যদি সে ৪০% অর্থ দিয়ে দেয়, তাহলে সে একজন বিশেষজ্ঞ ডাক্তারকে কত পার্সেন্ট দেয়? তার মুনাফা কত রাখে? সেবার মান আর সেবার অর্থমূল্যের ব্যবধানটা তাহলে কত আকাশ পাতাল?! এটা না করলে সে বর্তমানের চেয়ে বেশি মুনাফা করেও আরো কত কম মূল্যে একই মানের বা আরো উন্নত মানের সেবা দিতে সক্ষম হত?
এই কমিশন পদ্ধতিতে রোগী সংগ্রহের কারণে চিকিৎসা কেন্দ্রের প্রতিযোগিতার বিষয় হয়ে গেছে, কে কত বেশি কমিশন দিতে পারে? পরামর্শকদের বিষয় হয়ে দাঁড়িয়েছে, কোথায় পাঠালে আমার কমিশনের অংকটা একটু মোটা হবে; রোগীর কি হবে তা দেখার বিষয় নয়। অথচ রাসূলে কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন-

مَن أشارَ على أخيه بأمرٍ يَعلمُ أنَّ الرُشْدَ في غَيرِهِ فَقَد خَانَه”.
“যে ব্যক্তি তার (মুসলিম) ভাইকে কোন পরামর্শ দিল, অথচ সে জানে তার জন্য অন্য কিছু বেশী কল্যাণকর, তো সে তার সাথে খেয়ানত করলো।”
-সুনানে আবু দাউদ: ৩৬৫৭

অন্য হাদীসে এসেছে-

“الدين النصيحة. قلنا: لمن؟ قال: لله ولكتابه ولرسوله ولأئمة المسلمين وعامتهم”.

“দ্বীন হলো কল্যাণকামিতা। সাহাবায়ে কেরাম প্রশ্ন করলেন, কার জন্য কল্যাণকামিতা? রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন, আল্লাহ, তাঁর রাসূল, তাঁর কিতাব, মুসলমানদের ইমাম এবং জনসাধারণের জন্য”। -সহীহ মুসলিম: ৫৫

সুতরাং এসব কারণে হাসপাতালে রোগী পাঠিয়ে কোনো প্রকার কমিশন গ্রহণ করা জায়েয হবে না। তা হবে অন্যের সম্পদ অন্যায়ভাবে ভোগ করা। আল্লাহ তায়ালা বলেন,

يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَكُمْ بَيْنَكُمْ بِالْبَاطِلِ
“হে ঈমানদারগণ! তোমরা একে অন্যের সম্পদ অন্যায়ভাবে গ্রাস করো না” -সূরা নিসা (৪): ২৯

নাজায়েয পন্থায় সম্পদ উপার্জন; দান করার নিয়তেও বৈধ নয়; বরং তাতে গোনাহের মাত্রা আরো বেড়ে যায়। রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেন-

“من جمع مالا حراما، ثم تصدق به، لم يكن له فيه أجر، وكان إصره عليه”. أخرجه ابن حبان، وقال الشيخ شعيب: إسناده حسن … وأخرجه الحاكم … وصححه، ووافقه الذهبي.

“যে ব্যক্তি হারাম সম্পদ উপার্জন করে তা সদকা করলো, সে কোন সওয়াব পাবে না; বরং এর গুনাহ তার উপরই বর্তাবে” । (সহীহ ইবনে হিব্বান, ৩২১৬)
সুতরাং আপনার জন্য আবশ্যক হবে, কোনো রোগী পরামর্শ চাইলে কমিশন না নিয়ে আপনার জানামতে যেখানে রোগী স্বল্প খরচে উন্নত চিকিৎসা লাভ করবে, সেখানে পাঠানো। এটাই মুসলমানদের প্রতি কল্যাণকামিতার দাবী।


المصادر والمراجع:
قوله تعالي: “يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَأْكُلُوا أَمْوَالَكُمْ بَيْنَكُمْ بِالْبَاطِلِ إِلَّا أَنْ تَكُونَ تِجَارَةً عَنْ تَرَاضٍ مِنْكُمْ” (النساء: 29)
قال الإمام أبو بكر الجصاص (م: 370ه): وأكل مال الغير بالباطل قد قيل فيه وجهان: أحدهما: ما قال السدي، وهو أن يأكل بالربا والقمار والبخس والظلم. وقال ابن عباس والحسن: أن يأكله بغير عوض …. اهـ. (أحكام القرآن 2/216 ، دار الكتب العلمية)
وقال الإمام برهان الدين البخاري (م: 616) في المحيط البرهاني: وفي «نوادر ابن سماعة» عن أبي يوسف: رجل ضلّ شيئاً، فقال: من دلني عليه فله درهم فدلّه إنسان فلا شيء له؛ لأن الدلالة والإشارة ليست بعمل يستحق به الأجر، ولو قال لإنسان بعينه: إن دللتني عليه فلك درهم، فإن دلّه من غير شيء معه فكذلك الجواب لا يستحق به الأجر وإن مشى معه ودلّه فله أجر مثله، لأن هذا عمل يقابل الأجر عرفاً وعادة إلا أنه غير مقدر ففسد العقد ووجب به أجر المثل. اهـ. (7/485 ، دار الكتب العلمية)
وقال العلامة الحصكفي: (م: 1088ه) : إن دلني على كذا فله كذا فدله فله أجر مثله إن مشى لأجله.
من دلني على كذا فله كذا فهو باطل ولا أجر لمن دله إلا إذا عين الموضع. اهـ
وقال الشامي تحته: (قوله: إن دلني إلخ) عبارة الأشباه: إن دللتني. وفي البزازية والولوالجية: رجل ضلَّ له شيء فقال: من دلني على كذا فهو على وجهين: إن قال ذلك على سبيل العموم بأن قال: من دلني فالإجارة باطلة؛ لأن الدلالة والإشارة ليست بعمل يستحق به الأجر، وإن قال على سبيل الخصوص بأن قال لرجل بعينه: إن دللتني على كذا فلك كذا إن مشى له فدله فله أجر المثل للمشي لأجله؛ لأن ذلك عمل يستحق بعقد الإجارة إلا أنه غير مقدر بقدر فيجب أجر المثل، وإن دلَّه بغير مشي فهو والأول سواء. اهـ (رد المحتار: 9/ 195، مكتبة الأزهر)
ومثله في الهندية: (4/514، دار الكتب العلمية) وفي شرح الأشباه للحموي: (3/128، دار الكتب العلمية)
وفي إمداد الفتاوي: 3/410 طبيب وعطار ميں چہارم كا معامله
سوال (413) حكيم وعطار ميں چہارم كا معامله طے هو جاتا هے يعنى حكيم عطار سے يو ں كهتا هے كه جس قدر هم تمهارے يها ں نسخه جات بذريعه مريض روانه كريں اس ميں جو قيمت وصول هو، اس ميں سے چہارم همكو دينا، چنانچه اس كو عطار تسليم كر ليتا هے، تو اب فرمائے كه يه چہارم عطار كو دينا اور حكيم كو لينا درست هے يا نهيٖںٖ؟ جواب: درست نهيٖں –
وفي فتاوي اللجنة الدائمة: الفتوى رقم ( 8739 ) س : يتعامل كثير من الأطباء في العيادات الخاصة مع أصحاب المختبرات للتحاليل الطبية كالآتي: يحول الطبيب مرضاه المطلوب لهم إجراء تحاليل طبية إلى مختبر خاص معين، وهناك اتفاق مسبق بين الطبيب وصاحب المختبر على أن تكون للطبيب نسبة معينة تصل في بعض الأحيان إلى 50% من قيمة أجرة التحاليل التي يتقاضاها صاحب المختبر من المريض، وهي قيمة محددة بتسعيرة ثابتة من قبل وزارة الصحة، وليس لصاحب المختبر أن يتجاوزها وهو لا يتجاوزها فعلا، وإنما يدفع هذه النسبة للطبيب من حقه الخاص الذي يتقاضاه كأجرة من المريض، ولا يتأثر المريض في هذه الحالة؛ لأن صاحب المختبر هو الذي تنازل عن حقه في جزء من الأجرة .
1 – فهل على صاحب المختبر من إثم أو حرمة في هذا ؟
2 – وإذا طلب الطبيب تحاليل غير لازمة للمريض ليزيد نسبته دون علم صاحب المختبر ودون اتفاق مسبق على هذا بل إن صاحب المختبر يبرأ إلى الله من هذا ، وهو لا يعلم ما في نفس الطبيب، إنما يقوم بإجراء التحاليل المطلوبة من قبل الطبيب باعتباره يطلب التحاليل اللازمة للمريض فقط، ويؤدي عمله بإخلاص ودقة، ويخشى الله في إتقان عمله، فهل على صاحب المختبر من حرمة في هذا ؟
وإن سألتني: مادمت تعلم أن هذه التحاليل غير لازمة فلم تقوم بإجرائها؟ أقول لك: إنني لا أعلم إنها غير لازمة، فالطبيب هو الذي يقوم بالتشخيص وطلب التحليل اللازم، والله أعلم بسريرته وما في نفسه، وإنما سألت هذا السؤال لأن بعض الناس يواجهني به، فهل ينتقل الحرام إلى ذمتي ؟
ج: أولا: إذا كان الواقع كما ذكر من الاتفاق السابق بين الطبيب في عيادته الخاصة وصاحب المختبر على أن يحول الطبيب إلى صاحب المختبر عمل التحاليل على أن يكون له نسبة من أجرة التحليل – فذلك غير جائز للطرفين، لما فيه من الأثرة والتحجير على أصحاب المختبرات الأخرى، إلا إذا كان صاحب هذا المختبر له امتياز على غيره من جهة الصدق والأمانة والتفوق في التحليل،
(الجزء رقم : 24، الصفحة رقم: 434)
فيجوز تخصيصه بالتحويل عليه؛ لما في ذلك من مزيد مصلحة للمريض، وإعانة للطبيب على إحكام العلاج، لكن لا يجوز للطبيب أن يأخذ من صاحب المختبر نسبة من أجرة التحليل؛ لأنه أخذ مال في غير مقابل.
ثانيا : إذا علم صاحب المختبر أن الطبيب طلب تحاليل غير لازمة للمريض ليزيد فيما يأخذه من النسبة لم يجز له أن يقوم بعمل هذه التحاليل؛ لما في ذلك من التعاون معه على غش المريض وأكل ماله بالباطل، وعليه أن ينصح للطبيب عسى أن يتوب عن ذلك، وتسلم الأطراف الثلاثة، أما إذا لم يعلم صاحب المختبر بذلك فلا إثم عليه في القيام بتلك التحاليل.
وبالله التوفيق، وصلى الله على نبينا محمد وآله وصحبه وسلم .
اللجنة الدائمة للبحوث العلمية والإفتاء
عضو … نائب الرئيس … الرئيس
عبد الله بن قعود … عبد الرزاق عفيفي … عبد العزيز بن عبد الله بن باز.
وفي قرارات دائرة الإفتاء العام الأردنية: قرار رقم: (147) (12/ 2010)
حكم العمولة التي يأخْذها الطبيب من المراكز الطبية
الحمد لله رب العالمين، والصلاة والسلام على سيدنا محمد، وعلى آله وصحبه، وبعد:
فإن مجلس الإفتاء والبحوث والدراسات الإسلامية في جلسته السابعة المنعقدة يوم الخميس الواقع في: (17/ 8/ 1431هـ) الموافق (29/ 7/ 2010م)، قد اطلع على السؤال الآتي:
هل يجوز للطبيب أخذ عمولة من صيدلية أو مختبر أو مركز أشعة مقابل توجيه المرضى لتلك المراكز الطبية؟ وفي حال رفضت هذه المراكز دفع العمولة فإن الطبيب سيقوم بتوجيه مرضاه إلى مراكز أخرى.
وبعد الدراسة والبحث ومداولة الرأي؛ قرر المجلس ما يأتي:
إن هذه المعاملة غير جائزة، ولا تليق بمهنة الطب التي تهدف لخدمة الإنسان؛ وذلك للاعتبارات التالية:
أولاً: لأن فيها إيهاماً للمريض أن هذا المختبر أو مركز الأشعة هو الأفضل دون غيره، وهو حرام لقول الله تعالى: (يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ اتَّقُواْ اللّهَ وَكُونُواْ مَعَ الصَّادِقِينَ) التوبة/119.
ثانياً: أن فيها أكلاً لأموال الناس بالباطل؛ لأن الطبيب يأخذ مالاً في غير مقابل، ويكلف المريض تكاليف زائدة إضافة إلى العلاج والأدوية التي أصبحت مرتفعة جداً، والله تعالى نهى عن أكل أموال الناس بالباطل، فقال تعالى: (يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُواْ لاَ تَأْكُلُواْ أَمْوَالَكُمْ بَيْنَكُمْ بِالْبَاطِلِ إِلاَّ أَن تَكُونَ تِجَارَةً عَن تَرَاضٍ مِّنكُمْ وَلاَ تَقْتُلُواْ أَنفُسَكُمْ إِنَّ اللّهَ كَانَ بِكُمْ رَحِيماً) النساء/٢٩.
وتشتد الحرمة إذا ما قام الطبيب بطلب فحوصات أو صور لا يحتاج إليها المريض.
ثالثاً: أنها تفسد ذمة الطبيب وتحوله من كونه طبيباً يرفق بالمريض ويخفف عنه معاناته، إلى إنسان مادي يدفعه الطمع إلى أن يتاجر بالمرضى ويزيد من آلامهم ومعاناتهم.
رابعاً: أن هذا فيه مخالفة لأخلاقيات مهنة الطب، ولكن إذا استنصح المريضُ الطبيبَ في مختبر أو مركز أشعة، فيجب عليه النصح له؛ لأن النصح أمانة، وأن يدله على الأفضل بنظره، لقول الرسول عليه الصلاة والسلام: (الدين النصيحة). قلنا: لمن؟ قال: (لله ولرسوله ولأئمة المسلمين وعامتهم) رواه مسلم.
ولذا يجب على الأطباء التورع عن هذه الأعمال، وأن يقوموا بالنصيحة لمرضاهم ابتغاء الأجر والثواب عند الله سبحانه. والله تعالى أعلم.
رئيس مجلس الإفتاء
المفتي العام للمملكة / سماحة الشيخ عبد الكريم الخصاونة

نائب رئيس مجلس الإفتاء سماحة د. أحمد هليل

د. يحيى البطوش /عضو

سماحة الشيخ سعيد الحجاوي/ عضو

د.محمد خير العيسى /عضو

القاضي ساري عطية/ عضو

د.عبد الرحمن ابداح/ عضو

د. محمد عقلة الإبراهيم/ عضو

د. عبد الناصر أبو البصل/عضو

د. محمد الخلايلة/ عضو

د. محمد الغرايبة/ عضو

مقرر مجلس الإفتاء: د. أحمد الحسنات وقال الغزالي رحمه الله تعالى: المعاصي لا تتغير عن موضعها بالنية، فلا ينبغي أن يفهم الجاهل ذلك من عموم قوله عليه السلام: إنما الأعمال بالنيات، فيظن أن المعصية تنقلب طاعة بالنية، كالذي يغتاب إنسانا مراعاة لقلب غيره أو يطعم فقيرا من مال غيره أو يبني مدرسة أو مسجدا أو رباطا بمال حرام وقصده الخير فهذا كله جهل والنية لا تؤثر في إخراجه عن كونه ظلما وعدوانا ومعصية بل قصده الخير بالشر على خلاف مقتضى الشرع شر آخر فإن عرفه فهو معاند للشرع وإن جهله فهو عاص بجهله إذ طلب العلم فريضة على كل مسلم. اهـ (إحياء علوم الدين: 4/447 ، ط. دار الكتب) وورد في فتاوى اللجنة الدائمة (13/355) الفتوى رقم: (19585)

س: رجل لديه مبلغ من المال، ويريد أن يضعه في أي بنك من البنوك، وهو يعلم أن البنك سوف يعطيه قدرا من الربا، لكن الرجل يعلم أن المبلغ الزائد ربا وحرام، وإذا تركه أخذه البنك واستفاد من الربا. فهل يجوز له أن يأخذ الربا ويعطي الأسر الفقرة دون ابتغاء أي ثواب، فقط أن الأسر تستفيد من المال؛ لأنهم في حاجة ماسة إلى المال، ذلك بدلا من استفادة البنك؟
ج: لا يجوز إيداع الأموال في البنوك الربوية بقصد أخذ الفوائد الربوية لأي غرض كان؛ لأن الله حرم الربا، وتوعد عليه بأشد الوعيد، ولعن النبي صلى الله عليه وسلم آكله وموكله وشاهديه وكاتبه، فلا يجوز أخذه بنية التصدق به؛ لأنه كسب حرام وخبيث، والله طيب لا يقبل إلا الطيب. وبالله التوفيق وصلى الله على نبينا محمد وآله وصحبه وسلم.
اللجنة الدائمة للبحوث العلمية والإفتاء عضو … عضو … نائب الرئيس … الرئيس بكر أبو زيد … صالح الفوزان … عبد العزيز آل الشيخ … عبد العزيز بن عبد الله بن باز.
فقط والله تعالى أعلم بالصواب.

 

 আবু মুহাম্মাদ আব্দুল্লাহ আলমাহদী (হাফিযাহুল্লাহ)

২২-০৩-২০১৮ ইং